सोमवार, 16 अप्रैल 2012

कृषि कार्य माना होता तो जिंदा रहती मशरूम

रविंद्र पंवर, सोलन
'मशरूम सिटी ऑफ इंडिया' के नाम से मशहूर सोलन में मशरूम उत्पादन दम तोड़ने लगा है। देश को मशरूम से बने शाही पकवानों की सौगात देने वाले सोलन में इसकी पैदावार कम हो रही है। दुख यह कि 'खुंब नगरी' के तमगे को सहेजने में राज्य सरकारें असफल रही हैं। अब नगरी तो है लेकिन खुंब गायब हो रही है।
क्या है कारण
हिमाचल प्रदेश में मशरूम उत्पादन को कृषि कार्य घोषित न करने और इसके लिए विभागीय अनुदान सहित विपणन व्यवस्था न होने से मांग व उत्पादन में भारी अंतर आया है। इसका परिणाम है कि पहले सोलन के घर-घर में मशरूम की खेती होती थी, अब लोग हाथ खींचने लगे हैं। वर्तमान में हरियाणा अधिक उत्पादन के कारण मशरूम राज्य बनने की ओर अग्रसर है, वहां इसे कृषि कार्य घोषित किया गया है। इसके अलावा पंजाब, उत्तर प्रदेश व जम्मू-कश्मीर सहित कई राज्यों में मशरूम उत्पादन को कृषि का दर्जा प्राप्त है।
महाराजा पटियाला विदेश से लाए थे स्पॉन
सबसे पहले महाराजा पटियाला मशरूम स्पॉन (खुंब का बीज) विदेश से यहां लाए थे। उन्होंने चायल के समीप दोची स्थित अपने फार्म हाउस में मशरूम उगाना शुरू किया और बाद में इसकी सप्लाई भी की जाने लगी। इसके बाद 60 के दशक में सोलन से मशरूम को पहचान मिली और इससे बने व्यंजन गरीब की रसोई से लेकर बड़ी दावतों तक की शान बने। उस समय यहां पर एग्रीकल्चर कॉलेज में मशरूम उत्पादन की जानकारी दी जाती थी।
1997 में बनी 'मशरूम सिटी ऑफ इंडिया'
मशरूम उत्पादन के लिए सोलन का मौसम अनुकूल होने, साल में कई फसलें निकलने और इससे मिलने वाले तगड़े मुनाफे के कारण इसके प्रति लोगों का रुझान बढ़ा। एक समय वह भी आया जब सोलन के घर-घर में मशरूम उत्पादन शुरू हो गया। बाद में यहां पर मशरूम के राष्ट्रीय अनुसंधान केंद्र की स्थापना की गई, जिसे अब निदेशालय बना दिया गया है। सोलन में मशरूम पर हो रहे अनुसंधान व पैदावार के चलते 10 सितंबर 1997 को सोलन को 'मशरूम सिटी ऑफ इंडिया' का दर्जा मिला।
कृषि कार्य नहीं माना
1997 में केंद्र सरकार ने सभी राज्यों के विभागीय मुख्य सचिवों को मशरूम उत्पादन को कृषि कार्य की मान्यता देने के लिए पत्र लिखे थे। इस पर केवल तीन-चार राज्यों ने ही इसे कृषि कार्य के रूप में अपनाया, जबकि हिमाचल में इसे आज भी उद्योग के रूप में देखा जाता है। यहां पर किसान छोटे स्तर पर ही मशरूम उत्पादन करते हैं, जिससे वह विभागीय अनुदान व अन्य सुविधाओं से भी वंचित हैं। मशरूम प्लांट के लिए बिजली मीटर भी व्यावसायिक दर पर लगते हैं और उत्पादकों को महंगे दामों पर बीज व उपकरण खरीदने पड़ते हैं। विपणन की भी व्यवस्था नहीं है और उत्पादकों को तैयार माल बेचने का खुद इंतजाम करना पड़ता है।
उत्पादन कम मांग ज्यादा
मौजूदा समय में सोलन में प्रतिदिन लगभग चार क्विंटल मशरूम उत्पादन हो रहा है, जबकि मांग आठ क्विंटल से भी ज्यादा है। ऐसे में डिमांड पूरी करने के लिए यहां के बड़े उत्पादक बाहरी क्षेत्रों से मशरूम खरीद कर आगे सप्लाई कर रहे हैं, जबकि पहले यही उत्पादन आठ से दस क्विंटल होता था। इस व्यवसाय से जुड़े करीब सौ उत्पादकों की मांग है कि मशरूम निदेशालय सहित नौणी यूनिवर्सिटी और उद्यानिकी विभाग समय पर उन्हें बढि़या बीज उपलब्ध करवाए व खाद भी पर्याप्त मिले।
लागत व मुनाफे में फंसे उत्पादक
घटते रुझान का सबसे बड़ा कारण है कि उत्पादक अब लागत व मुनाफे में फंस गए हैं। पहले-पहले बढि़या बीज मिलता था और खाद सस्ती थी, जिससे 50 रुपये प्रतिकिलो तक के दाम में उत्पादकों को मुनाफा होता था। अब जबकि मशरूम के दाम 80-90 रुपये प्रतिकिलो हो गए हैं फिर भी महंगी खाद, घटिया बीज और अनुदान की कमी से उत्पादकों को घाटा हो रहा है। इससे औसत उत्पादन भी घट गया है और प्रति बैग लगभग तीन किलो उत्पादन घटकर डेढ़-पौने दो किलो रह गया है। यहां केवल दो-तीन उत्पादकों के पास ही मशरूम के एसी प्लांट हैं, जबकि बाकी लोग मौसम के हिसाब से फसल लेते हैं।
डीएमआर सफेद हाथी, उद्यानिकी विभाग में फंड नहीं
सोलन स्थित मशरूम अनुसंधान निदेशालय (डीएमआर) अब सफेद हाथी बनता जा रहा है और यहां के उद्यानिकी विभाग के पास फंड नहीं, जिससे उत्पादकों को फायदा हो। सोलन में बटन मशरूम ही अधिक पैदा हो रही है, जबकि एक फीसदी लोग डिंगरी मशरूम लगा रहे हैं। इसके अलावा डीएमआर ने ऋषि व मिल्की मशरूम की प्रजातियां तैयार की थी, जिसका यहां उत्पादन ही नहीं हो रहा। मशरूम की मुख्य बीमारी गीला बुलबुला का भी निदेशालय के पास कोई तोड़ नहीं, जिससे उत्पादकों को नुकसान उठाना पड़ रहा है। यही नहीं यहां के उद्यानिकी विभाग को सरकार की ओर से फंड नहीं मिल पाते, जिससे वह किसानों की सहायता में असमर्थ है। विभाग में बरसों पुराना खाद सयंत्र है, जिसे बदलने व अन्य कार्यो के लिए ऊपर से पैसा नहीं मिल रहा।
छोटे स्तर पर अनुदान का प्रावधान नहीं : धीमान
मशरूम विकास अधिकारी एमएल धीमान ने कहा कि मशरूम उत्पादन को कृषि कार्य घोषित करना सरकार पर निर्भर करता है। सोलन में किसान इस कार्य को छोटे-छोटे स्तर पर कर रहे हैं, जिन्हें अनुदान का प्रावधान नहीं। दूसरी तरफ जिन लोगों ने उद्योग की तर्ज पर मशरूम प्लांट लगाए हैं, उन्हें उद्योगों के फायदे मिल रहे हैं।

खुम्ब में बनाएं शानदार भविष्य

मशरूम की खेती से होने वाले लाभ से उत्साहित होकर अब हर किसान व आम व्यक्ति इसकी खेती कर अच्छा मुनाफा कमा रहे हैं। मशरूम अब कैरियर से जुडा सेक्टर माना जाने लगा है। इसका सामान्य प्रशिक्षण लेकर काफी पैसा कमाया जा सकता है।
भारत में मशरूम का व्यावसायिक उत्पादन बहुत तेजी से लोकप्रिय होता जा रहा है। मशरूम एक प्रकार का फंगस (कवक) है। इसे खुम्ब के नाम से भी जाना जाता है। यह एक बहुत ही स्वादिष्ट और पौष्टिक खाद्य पदार्थ है, लेकिन हर खुम्ब खाने योग्य नहीं होती और कुछ बहुत ही विषैली होती हैं। विश्व में दो हजार से ज्यादा किस्मों की मशरू म पाई जाती है, लेकिन इसमें करीब 25॰ प्रकार की मशरूम खाने योग्य होती है। अब तक सौ से ज्यादा मशरूम की प्रजातियों को खाद्य पदार्थ के रूप में अपनाया जा चुका है और इनमें से लगभग 35 की व्यावसायिक खेती दुनियाभर में की जा रही है। मुख्यरूप से उगाई जाने वाली मशरूम में सफेद बटन खुम्ब, शिटाके, ढोंगरी, ब्लैक ईयर मशरूम, धान पुआल खुम्ब और दूधिया मशरूम शामिल हैं। विश्व में हर साल लगभग 5॰ लाख टन खुम्ब का उत्पादन किया जाता है।

मशरूम पर शोध
दिल्ली के आसपास जैसे जीटी करनाल रोड के निकट अलीपुर ब्लॉक के कुछ गांवों में तो बडे पैमाने पर मशरूम की खेती की जा रही है। मशरूम की खेती न्यूनतम दो हजार रुपए से शुरू की जा सकती है। इसकी खेती की अपार संभावनाओं को देखते हुए सोलन स्थित नेशनल रिसर्च सेंटर फॉर मशरूम विदेश में उगाई जाने वाली मशरू म पर काफ ी शोध कर रहा है, जिसमें संस्थान को विभिन्न प्रजातियां उगाने में सफलता भी हासिल हुई है।
मशरूम का उत्पादन
इसकी सबसे खास बात यह है कि उत्पादन बेकार बचे कृषि अवशेषों पर किया जाता है। इसकी खेती के लिए उपजाऊ भूमि और खेत और सूरज के प्रकाश की जरू रत नहीं पडती, इसलिए बंजर भूमि का उपयोग कर बेकार पडी खाली जमीन पर मशरूम की खेती कर लाभ कमाया जा सकता है। मशरूम की खेती मशरूम हाउस या हाट बनाकर भी की जा सकती है।
मशरूम की प्रजातियां
मशरूम की कुछ प्रजातियां तो महज पंद्रह से बीस दिनों में ही उगनी शुरू हो जाती हैं, जबकि कुछ प्रजातियों को उगने में ढाई महीने तक का समय लग जाता है। खुम्ब की खेती छोटे किसानों, बेरोजगारों और गृहणियों के लिए अजीविका का सबसे सशक्त साधन है। इसके उत्पादन के बाद बची कंपोस्ट का एक अति उत्तम ऑर्गेनिक खाद के रूप में भी प्रयोग किया जा सकता है और सबसे बडी बात मशरूम उत्पादकों के लिए निर्यात से लाभ कमाने की अपार संभावना है।
खेती भी आसान
उत्तर भारत के मैदानी भागों में सर्दी के महीनों में बटन खुम्ब और गर्मियों में धान पुआल खुम्ब की खेती आसानी से की जा सकती है। हमारे देश के उत्तरी भाग में सफेद बटन मशरूम सबसे अधिक उगाई जाने वाली मशरूम है। देश में हर साल लगभग 36 से 38 हजार टन सफेद बटन मशरूम का उत्पादन किया जाता है। इसकी मुख्य रूप से दो प्रजातियां-1. एगेरिकस बाइस्पोरस और 2. एगेरिकस बाइटोरक्विस हैं। इसकी खेती करने के लिए सबसे उपयुक्त माध्यम गेहूं अथवा धान का भूसा है, जिसकी उर्वरकता बढाने के लिए गन्ने का शीरा, घोडे की लीद, पॉल्ट्री मैन्योर, गेहूं की भूसी और विभिन्न रासायनिक खादें मिलाई जाती हैं। इन सब चीजों को मिलाकर भूसे को सडाया जाता है और उसकी कंपोस्ट बनाई जाती है। इसी कंपोस्ट से बटन मशरूम की खेती की जाती है।
यह खराब नहीं होता
सफेद बटन मशरूम की खेती दो प्रकार से की जाती है। पहला सीजनल और दूसरा नियंत्रित वातावरण में। सीजनल खेती के लिए उत्तरी भारत के मैदानी भाग में इसे उगाने का मौसम अक्टूबर से मार्च मध्य तक है। बटन मशरूम का उत्पादन वातावरण से बहुत प्रभावित होता है। इसके कवक जाल फैलने के लिए 22 से 26 सेंटीग्रेट तापमान पर इसके फलनकाय जल्द और ठोस बनते हैं। इससे कम तामपान पर इसकी बढने की क्षमता धीमी पड जाती है। बटन मशरूम की भंडारण अवधि बहुत कम होती है, इसलिए फसल के मौसम में ही इसका डिब्बाबंद संरक्षण कर लिया जाता है जिसे एक साल तक उपयोग में लाया जा सकता है।
खेती करें, धन कमाएं ज्यादा
नियंत्रित वातावरण में बटन मशरूम की खेती सालभर की जा सकती है। इस दौरान मशरूम की चार से पांच फसल आसानी से ली जा सकती है। मशरूम की सीजनल खेती में लागत कम होने की वजह से यह हमारे देश में अधिक लोकप्रिय है।

खेती बिना खेत के, आमदनी जेब भरके

घर में उत्पादन
-कृषि विश्वविद्यालय से प्रशिक्षण पाकर सफल हो रहे किसान
- बीज उत्पादन के गुर सिखाने से लेकर मदर कल्चर मिल रहा मुफ्त
- विश्वविद्यालय व कृषि विज्ञान केन्द्र से किसान उठा सकते बीज
अमरेन्द्र तिवारी,मुजफ्फरपुर : 'खेती बिना खेत के..' सुनकर आपको भले आश्चर्य लगे, लेकिन बात है सौ फीसदी सही। राजेन्द्र कृषि विश्वविद्यालय पूसा की पहल पर बिना खेत वाले लोग भी मशरूम की खेती कर अपनी जेबें भर रहे हैं। विश्वविद्यालय की पहल पर विश्वविद्यालय के परिसर से सटे पोखरैरा की रेहाना खातून तो इसका रोल मॉडल बन गई है। पति की मजदूरी से परिवार चलानेवाली रेहाना खुद अपनी मेहनत से एक छोटी सी झोपड़ी के अंदर मशरूम की खेती कर हर माह 15 सौ से दो हजार रुपये तक की आमदनी कर रही है। इनकी प्रेरणा से 20-25 महिलाएं अपने घर में मशरूम का उत्पादन कर रही हैं। इस गांव की सुलेखा राय, रीता देवी, अर्चना तिवारी व जरीना की मानें तो मशरूम की खेती गरीबों के लिए वरदान है। खाने के लिए सब्जी मिल जाती है वहीं इतनी मांग है कि घर से लोग खरीद कर ले जाते हैं।
कैसे हो रही लाभदायक
खेती करने वाली रेहाना बताती है कि दस किलो भूसा को उबालकर फिर उसे मोटरी बनाकर टांग देती है। सुबह में पांच बैग तैयार करती है। एक बैग में सौ ग्राम बीज डालकर पॉलीथीन में रखकर घर में टांग दिया जाता। 15 से 16 दिन में बाद फसल तैयार और एक बैग से 250 ग्राम से लेकर 300 ग्राम तक उत्पादन प्राप्त होता है। स्थानीय स्तर पर यह 150 रुपये से दो सौ रुपये किलो तक बिक जाता है। यह पौष्टिक होने के साथ-साथ इतना स्वादिष्ट होता है कि इसकी सब्जी, पकोड़ा आदि लोग खूब खाते हैं।
कब-कब करें खेती
कृषि वैज्ञानिक डा. दयाराम की मानें तो मशरूम सालों भर की खेती है। लेकिन, सितम्बर से मार्च तक बेहतर उत्पादन किया जा सकता है। 70 रुपये प्रति किलो की दर से बीज किसानों को उपलब्ध कराया जा रहा है। बीज 15 से 20 दिन में तैयार हो जाता है।
बोले कुलपति
राजेन्द्र कृषि विश्वविद्यालय पूसा के कुलपति मेवालाल चौधरी का कहना है कि बदलते बिहार में मजदूरों की माली हालत मजबूत करने में मशरूम की खेती वरदान साबित हो रही है। कम लागत में ज्यादा मुनाफा तथा बाजार की अपार संभावना। सभी कृषि विज्ञान केन्द्र के प्रभारी को आदेश दिया गया है कि वह मशरूम खेती के प्रशिक्षण के साथ-साथ इच्छुक लोगों को बीज उपलब्ध करावें। विश्वविद्यालय परिसर में सालों भर बीज उपलब्ध है। बिहार के सभी जिलों में एक अभियान के तहत जागरुकता कार्यक्रम चल रहा है। पर्याप्त उत्पादन होगा तो इसे मिड डे मिल योजना में शामिल कराने के लिए पहल होगी।

जमीन के बिना भी खेती करने का कमाल दिखाया महिलाओं ने

नक्सल आतंक से पीड़ित महिलाएं कर रही हैं मशरूम की खेती


जमीन के बिना खेती नहीं हो सकती, लेकिन मशरूम की खेती के जरिए इसे संभव बनाया है छत्तीसगढ़ के दक्षिण बस्तर (दंतेवाड़ा) जिले के कासौली राहत शिविर में निवासरत मॉ शारदा स्व-सहायता समूह की महिलाओं ने। नक्सल हिंसा और आतंक के चलते घर छोड़ने को मजबूर ग्रामीण परिवारों की ये गरीब महिलाएं अपने बुलंद हौसलों और कड़ी मेहनत से न केवल बंद कमरे में मशरूम की खेती कर अपना और अपने परिवार का भरण-पोषण अच्छी तरह कर रही है बल्कि भूमिहीन लोगों के सामने उन्होंने आत्मनिर्भरता का एक उदाहरण भी पेश किया है।
     ज्ञातव्य है कि नक्सल पीड़ित दक्षिण बस्तर जिले के अनेक गांवों के लोग नक्सल हिंसा और आतंक से त्रस्त होकर अपना घर-बार, खेत-बाड़ी को छोड़ कर राज्य शासन की मदद से विभिन्न शिविरों में अपना गुजर बसर कर रहे हैं। शिविर में रह रहे लोगों को राज्य सरकार जहॉ मूलभूत सुविधाएं मुहैया करा रही है वहीं इन ग्रामीणों को अपने पैरों में खड़े होने तथा उन्हें आत्मनिर्भर बनाने विभिन्न व्यवसाय मूलक प्रशिक्षण एवं सहायता भी शासन की ओर से दी जा रही है। इसी कड़ी में जिले के गीदम विकासखण्ड स्थित कासौली राहत शिविर में रहने वाली महिलाएं मलको, सिमरी, राधा, कुमली, लाखे, नहिनों, पाइके, चिमरी, पाकली, चमली तथा सीते ने मॉ शारदा स्व सहायता समूह का गठन किया और बिना भूमि की खेतीमशरूम उत्पादन का निर्णय लिया। इस समूह को विशेष राहत योजना के तहत शासन द्वारा आवश्यक प्रशिक्षण एवं सुविधाएं मुहैया करायी गयी और आज इस समूह की महिलाएं बिना भूमि के केवल एक बंद कमरे में मशरूम का विपुल उत्पादन कर न केवल आत्मनिर्भर हुयी है बल्कि सभी को दातों तले उंगली दबाने को मजबूर कर दिया है।  
          उल्लेखनीय है कि शाकाहारी एवं मांसाहारी सभी लोगों की विशेष पंसद मशरूम आज व्यजंनो में अपना विशेष महत्व रखता है। कम लागत, हर मौसम में बिना भूमि के मात्र एक बंद कमरे में कम मेहनत एवं आसानी से उत्पादन होने के कारणमशरूम की दिनोदिन मांग एवं महत्व बढ़ता जा रहा है। समूह की अध्यक्ष श्रीमती मलकों कहती है कि वे लोग नक्सल हिंसा के चलते अपना घर, खेत-बाड़ी को छोड़कर सुरक्षा हेतु शिविरों में आना पड़ा यहॉ वे लोग दैनिक मजदूरी कर अपना जीवन निर्वहन कर रहे थे परंतु अब मशरूम उत्पादन से उन्हें अच्छी आमदनी होने लगी है। वो बताती है कि कम पूंजी और मात्र 20 से 25 दिनों में मशरूम का उत्पादन होने लगता है। मशरूम उत्पादन हेतु स्पॉन (बीज) 40 से 50 रूपये प्रति किलो की दर से बाजार में आसानी से मिल जाता है और एक किलो बीज से 10 से 15  किलों मशरूम का उत्पादन होता है। समूह की सदस्य श्रीमती पाइके बताती है कि जब हमें कृषि विभाग के अधिकारियों द्वारा मशरूम उत्पादन का प्रशिक्षण दिया जा रहा था तब हमें यह बहुत ही कठिन लग रहा था परंतु यह तो बहुत ही आसानी से होता है। समूह की अन्य सदस्य श्रीमती चिमरी बताती है कि मशरूम तैयार करने के लिए धान अथवा गेहूं की भूसी के गोले बनाकर उसमें स्पॉन मिलाकर पालीथीन में डालकर नमीयुक्त छप्पर के नीचे रखते है । नमी बनाये रखने के लिए समूह के सदस्य बारी-बारी से इसमें पानी का छिड़काव करते है और खाली समय में महिलाएं अपने घर एवं मजदूरी का कार्य करती है। सदस्य श्री नहिनों कहती है कि प्रतिदिन 3 से 4 किलों मशरूम का उत्पादन हो जाता है तथा बारिश के दिनों में 100 से 150 रूपये तथा गर्मियों में 200 से 250 रूपये प्रति किलो की दर से मशरूम बिक जाता है। मशरूम खरीदने गीदम एवं दंतेवाड़ा से लोग कासौली आते है वहीं गीदम बाजार में हाथो-हाथ मशरूम अच्छी कीमत में बिक जाता है। आज मशरूम की बिक्री से समूह के खाते में 15 हजार रूपये भी जमा हो गये है। वहीं समूह की महिलाओं ने बिक्री में से एक-एक हजार रूपयों से अपने-अपने घर की जरूरतों का समान भी खरीद लिया है। मशरूम की बढती मांग को देखते हुए समूह की महिलाएं काफी उत्साहित है और इसे बड़े पैमाने पर इसकी खेती करने की ठान ली है।
          कृषि विभाग के अधिकारियों का कहना है कि मशरूम पौष्टिकता की दृष्टि से भी काफी महत्वपूर्ण है। इसमें प्रोटीन, फाइबर्स एवं फोलिक एसिड के तत्व समाहित होते हैं जो स्वास्थ्य की दृष्टि से काफी लाभदायक होते हैं। आज मशरूम के इन्ही गुणों के कारण इसकी मांग बढ़ती जा रही है। शहरों में मशरूम के आचार, मुरब्बा एवं सूप पाउडर के साथ ही दवाईयों में भी इसकी खासी मांग है। मॉ शारदा स्व सहायता समूह की सफलता को देखकर अन्य महिलांए एवं समूह भी इस और आकृष्ट हो रहे है।

फाइव स्टार होटलों में होगी मशरूम की सप्लाइ


 बिहारशरीफ( नालंदा) : ऑएस्टर मशरूम के बाद बटन मशरूम का उत्पादन भी जिले में शुरू हो गया है. परबलपुर प्रखंड के मिर्जापुर गांव की रिंकू देवी मशरूम का व्यावसायिक उत्पादन करनेवाली जिले की पहली महिला बन गयी है.
सोमवार को रिंकू देवी द्वारा उत्पादित 12 किलो बटन मशरूम की मार्केटिंग शुरू हो गयी. जिला कृषि पदाधिकारी सुदामा महतो ने बटन के मार्केटिंग की शुरुआत करते हुए कहा कि जिले में ऑएस्टर मशरूम का उत्पादन तो बड़े पैमाने पर किया जा रहा है.
प्रतिदिन 20 से 25 क्विंटल ऑएस्टर मशरूम का उत्पादन जिले की महिला समूहों द्वारा किया जा रहा है,लेकिन बटन मशरूम का उत्पादन न होने से एक कसक थी. बटन मशरूम की काफी मांग थी. कई नामी-गिरामी होटलों द्वारा ऑएस्टर मशरूम की जगह बटन मशरूम की मांग की जा रही थी. स्थानीय स्तर पर भी लोग बटन मशरूम की मांग कर रहे थे.
अब जिले में बटन मशरूम का उत्पादन शुरू होने से इस मांग को पूरा करने में मदद मिलेगी. श्री महतो ने बताया कि जिले में महिलाओं के करीब 900 समूह बने हुए हैं,सभी आत्मा द्वारा निबंधित हैं. इन महिलाओं को प्रशिक्षण की सुविधा के साथ ही उत्पादित सामान के विपणन में आत्मा सहयोग कर रहा है.
राष्ट्रीय बागबानी मिशन के सहयोग से राजगीर में स्पॉन लैब खोला गया है. इन प्रयासों के माध्यम से जिले में मशरूम उत्पादन कर अच्छी आय प्राप्त हो रही है. जिला कृषि पदाधिकारी सुदामा महतो ने बताया कि बटन मशरूम के उत्पादन की तकनीक व प्रशिक्षण प्राप्त करने के लिए जिले की पांच महिलाओं को राष्ट्रीय खुंब अनुसंधान केंद्र सोलन,हिमाचल प्रदेश भेजा गया था, जिसका नतीजा सामने है.
जिस प्रकार से यहां की महिलाएं खेती व मशरूम उत्पादन में मेहनत कर रही हैं,उससे उम्मीद बनती है कि निकट भविष्य में नालंदा मशरूम उत्पादन में अपना एक अलग पहचान बनाने की राह पर है.
डीएओ श्री महतो ने मिर्जापुर गांव जाकर बटन मशरूम उत्पादन यूनिट को भी देखा. इस अवसर पर राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा मिशन के परामर्श दाता कुमार किशोर नंदा,विषय वस्तु विशेषज्ञ मो आलमगीर अनवर व तकनीकी सहायक अक्षय नंदन प्रसाद आदि मौजूद थे.
 

मटन मशरूम बनाने की विधि

मटन मशरूम बनाने के लिए सामग्री
500 ग्राम मटन, 500 ग्राम मशरूम, 350 ग्राम दही, 1 किलो प्याज, 12 कलि लहसुन, 1 इंच पिसा अदरक, 5 -6 बड़े चम्मच घी या तेल, 1 छोटी चम्मच चम्मच पिसा गरम मसाला, 1 छोटी चम्मच पीसी लाल मिर्च, 4 छोटी चम्मच पिसा धनिया, 5 -7 तेजपत्ते, हरा धनिया व कटी हरी मिर्च|

विधि
सबसे पहले पिसा लहसुन, अदरक , पिसा धनिया, लाल मिर्च, हल्दी व नमक को दही में भली भांति मिलाकर रख लें|
फिर इसमें धूले मटन मिलाकर व ढककर छह- साथ घंटे तक अलग रख दें|
प्याज व मशरूम को दो भागों में काट लें| कुकर में तीन बड़े चम्मच तेल गर्म करके इसमें तेजपत्ते व प्याज डालकर प्याज को सुनहरी भून लें| कुछ समय बाद दही मिश्रण समेत मटन डालकर भली भांति भून लें| मटन को सिटी देकर अच्छी तरह गला लें|
बाकी बची प्याज को भुनकर व कटे मशरूम डालकर नरम कर लें|
अब सूखे मटन में मशरूम मिश्रण डालकर भली भांति भून लें|
अंत में गरम मसाला, कटा हरा धनिया व हरी मिर्च बुरककर स्वादिष्ट मटन मशरूम पेश करें|

मशरूम उत्पादन कर हुआ आत्मनिर्भर



कभी दिहाड़ी मजदूरी करने वाला मजीर अंसारी आज का मशरूम उत्पादक बन गया है। सरैयाहाट प्रखंड स्थित बाबूडीह गांव का रहने वाले मजीर ने इसे धंधे के रुप में अपना कर जीविकोपार्जन का आधार बना लिया है। मजीर कहता है कि एक दौर था जब वह दिहाड़ी मजदूरी कर अपने परिवार का भरण-पोषण करने में विफल था। कभी-कभी तो एक शाम भूखे सोने की भी लाचारी आन पड़ती थी, पर अब बात दूसरी है। आज वह न सिर्फ मशरूम उत्पादन कर आत्मनिर्भर बन गया है बल्कि दूसरे भी उससे प्रेरित होकर मशरूम की खेती करने लगे हैं। बाबूडीह निवासी नजीर मेरठ एवं दिल्ली जैसे शहरों में मजदूरी करके ऊब चुका था। फिलहाल वह प्रशिक्षण हासिल कर मशरूम की खेती कर रहा है। मो.नजीर ने बताया कि 200 ग्राम मशरूम का बीज लगाकर वह दो-ढाई सौ रुपया कमा लेता है। मशरूम उत्पादन में उसका परिवार भी सहयोग कर रहा है और अब उसकी चाहत है कि बड़े पैमाने पर मशरूम की खेती करे। हालांकि उसने कहा कि इसके लिए पूंजी की कमी है। ऐसे में अगर सरकारी स्तर पर मदद मिल जाए तो बात बन सकती है। नाजीर कहता है कि यह सही है कि लोकल मार्केट में मशरूम का डिमांड कम है, इसके बावजूद दिहाड़ी मजदूरी करने से यह काफी बेहतर व इज्जत का काम है। मशरूम की खेती कर महीने में पांच-छह हजार रुपये की आमदनी है जो कि बेहतर है।