सोमवार, 16 अप्रैल 2012

मशरूम उत्पादन युवाओं के लिए बेहतर व्यवसाय

मशरूम यानी खुंबी। इसे गांवों में छतरी व कुकरमुत्ता आदि नामों से जाना जाता है। दरअसल मशरूम को मृत कार्बनिक पदार्थों पर उगने वाला एक मृतजीवी कवक भी कहते हैं। यह खुंबी उत्पादन ग्रामीण युवाओं के लिए अच्छा व घरेलू व्यवसाय साबित हो सकता है।


शैक्षिक योग्यता
प्रशिक्षण कार्यक्रमों में प्रवेश के लिए आयु सीमा व शैक्षिक ज्ञान संबंधी कोई अनिवार्यता नहीं होती, फिर भी तमाम तकनीकी पहलुओं को समझने के लिए मिडिल या दसवीं पास होना बेहतर है।
पाठयक्रम का स्वरूप
मशरूम उत्पादन में रुचि लेने वाले उम्मीदवारों के लिए देशभर के विभिन्न कृषि विश्वविद्यालयों व कृषि अनुसंधान केंद्रों में साप्ताहिक, पाक्षिक तथा मासिक अवधि के कोर्स संचालित किए जाते हैं। इन पाठय़क्रमों का उद्देश्य मशरूम उत्पादन की नई-नई तकनीक व बीजों की अच्छी नस्ल से परिचित कराना है।
विभिन्न किस्में
खुंबियों में एगैरिकस बाइपोरस, वालवैरियल्ला स्पीसिज, प्ल्यूरोटस स्पीसिज, लेन्टाइनस इडोसिस और फलैम्यूलाइना बेल्यूटाइप्स प्रमुख हैं, लेकिन भारत में पहली तीन खुंबियों की खेती की जाती है।
सरकारी ऋण व्यवस्था
मशरूम उत्पादन को स्वरोजगार के रूप में अपनाने वाले उम्मीदवारों को सरकार व राज्य सरकार की ओर से आर्थिक सहायता की व्यवस्था यह सहायता कृषि मंत्रालय (भारत सरकार) द्वारा दी जाती है। इसमें पांच लाख रुपए तक की वित्तीय सहायता का प्रबंध है। गौरतलब है कि मशरूम उत्पादन से जुड़े एससी/ एसटी उम्मीदवारों को सरकारी ऋण में राहत की भी
व्यवस्था है।
मशरूम के लिए जलवायु
मशरूम उत्पादन के लिए अलग-अलग जलवायु या वातावरण की आवश्यकता होती है। टेम्परेंट मशरूम के लिए 20 से 30 डिग्री सेल्सियस तापमान व 70 से 90 फीसदी नमी जरूरी है।
इसका उत्पादन अक्तूबर से फरवरी के बीच ठीक रहता है। ऑयस्टर मशरूम के लिए तापमान 20 से 30 डिग्री सेल्सियस तथा नमी 80 फीसदी से अधिक होनी चाहिए। इसके उत्पादन के लिए सितम्बर-अक्तूबर का महीना बेहतर माना जाता है। वॉल वैरियल्ला के लिए तापमान 30 से 40 डिग्री सेल्सियस व नमी 80 से ज्यादा होनी चाहिए। इसका उत्पादन अप्रैल से अक्तूबर के बीच किया जाता है। मशरूम उत्पादन में जलवायु का खास महत्त्व है, अत: इसे नजरअंदाज नहीं किया जाना चाहिए।
प्रशिक्षण संस्थान
राष्ट्रीय बागवानी अनुसंधान एवं विकास फाउंडेशन बागवानी भवन, पंखा रोड, सागरपुर, नई दिल्ली
पादपरोग संभाग, भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद, नई दिल्ली।
राष्ट्रीय खुंब अनुसंधान केंद्र, चम्बाघाट, सोलन, हिमाचल प्रदेश।
स्नोव्यू मशरूम लैब एवं ट्रेनिंग सेंटर, नरेला, दिल्ली-40
पंजाब एग्रीकल्चर यूनिवर्सिटी, लुधियाना पंजाब-141004
हिसार कृषि अनुसंधान, हिसार, हरियाणा
इलाहाबाद एग्रीकल्चर इंस्टीटयूट, इलाहाबाद, यूपी
आणंद एग्रीकल्चर यूनिवर्सिटी, आणंद, गुजरात
जेबी पंत यूनिवर्सिटी ऑफ एग्रीकल्चर एंड टेक्नोलॉजी, पंत नगर, उत्तरांचल-263145
मशरूम : पौष्टिक आहार
मशरूम एक पौष्टिक आहार है। इसमें खनिज, लवण, विटामिन तथा एमीनो एसिड जैसे पौष्टिक तत्त्व पाए जाते हैं। मशरूम हृदय रोग एवं मधुमेह जैसी बीमारियों के इलाज में सहायक है। मशरूम में फोलिकएसिड तथा लावणिक तत्त्व पाए जाते हैं, जो खून में लालकण बनाने में मददगार होते हैं।

मशरूम का उत्पादन कर महिलायें बन रही आत्मनिर्भर

हिलसा(नालंदा), निज प्रतिनिधि : राज्य सरकार द्वारा कृषि के क्षेत्र में दिये जा रहे प्रोत्साहन से आगे आकर हिलसा प्रखंड की महिलायें आत्मनिर्भरता की ओर बढ़ रही है। प्रखंड में तकरीबन 15 से अधिक कार्यरत स्वयं सहायता समूहों के माध्यम से महिलाये मशरूम का उत्पादन कर काफी अच्छी आमदनी कर रही है। यहां की महिलाओं के द्वारा उत्पादित मशरूम की मीनू राजधानी के नामी-गिरामी होटलों में शामिल हो रही है। ठंड के मौसम में क्षेत्र में महिलायें मशरूम का अच्छा उत्पादन कर रही है। मगध महिला उद्यमिता विकास समूह कृष्णापुर हिलसा की कुमारी अल्पना सिन्नी मशरूम का उत्पादन कर काफी खुश है। उसके द्वारा उत्पादित मशरूम पटना के होटलों के मीनू में शामिल हो रही है। कुमारी अल्पना सिन्नी का कहना है कि सरकार के द्वारा इसके उत्पादन के लिए स्पौन, पारमोलीन, वाविस्टीन, पालिथीन बैग आदि दी जा रही सहायता से हमलोग की आत्मनिर्भरता बढ़ी है। स्थानीय प्रखंड कृषि पदाधिकारी रामदेव राम, प्रखंड आत्मा अध्यक्ष भारतेन्दु आनंद एवं नालंदा जिला आत्मा का काफी सहयोग मिला है और हमें घर में ही रहकर अच्छी आमदनी हो रही है। प्रखंड कृषि पदाधिकारी रामदेव राम के अनुसार प्रखंड में 15 से अधिक महिलाओं का स्वंय सहायता समूह मशरूम के उत्पादन में जुटी है। राजगीर महोत्सव में महिलाओं ने स्टाल लगाकर उत्पादित मशरूम का प्रदर्शन की। इसके उत्पादन के लिए प्रशिक्षक मीना कुमारी एवं रंजू कुमारी एवं कृषक सलाहकार सक्रिय रहते हैं।

मशरूम की खेती ने बदली महिलाओं की तकदीर

साहिबगंज,जासं : मशरूम की खेती से जिले की महिलाएं न केवल कम लागत में अधिक मुनाफा कमा रही हैं बल्कि उनकी तकदीर ही बदल गई है। जनवरी माह में जिला कृषि विज्ञान केंद्र की ओर से जिले की 46 महिलाओं को मशरूम की खेती के लिए प्रशिक्षण दिया गया था और बाद में बोरियो प्रखंड की 92 महिला स्वयं सहायता समूहों को स्वरोजगार के लिए 10-10 हजार रूपये का चेक भी दिया गया था ताकि महिलाओं में सशक्तिकरण आ सके। बाद में बरहड़वा,बरहेट व बोरियो प्रखंड की महिलाओं को मशरूम की खेती का प्रशिक्षण दिया गया सभी महिलाओं ने इसे रोजगार का जरिया बनाया और आज वे खूशहाल हैं। जिला कृषि विज्ञान केंद्र के वैज्ञानिक किरण मेरी कंडीर का कहना है कि मशरूम न केवल एडस जैसे भयानक रोग से बचाने की क्षमता रखता है वरन उच्च रक्त चाप, मधुमेह,हृदय रोग, मोटापा,गठिया,एलर्जी व कैंसर से भी लोगों को बचाने की क्षमता रखता है। यह कई विटामिनों से भी लवरेज है।
साहिबगंज के जिला कृषि विज्ञान केंद्र की वैज्ञानिक किरण मेरी कंडीर का कहना है कि मशरूम की खेती काफी कम खर्च में अधिक मुनाफा देने वाला होता है। इसके लिए काफी अधिक जगह की भी आवश्यकता नहीं पड़ती है। इसकी खेती के लिए घर के किसी भी कमरे का बेकार पड़े गैरेज का उपयोग किया जा सकता है। इसमें पुआल की कुट्टी का डेढ़ इंच का स्तर बनाकर उसमें मशरूम के बीज डाले जाते है। इससे पहले इसमें कुछ रसायन का प्रयोग करते है। 20 दिन के बाद कुट्टी पर सफेद रंग के जाल दिखने लगते है, जो 30 दिनों के बाद तैयार होने लगता है। मशरूम में काफी मात्रा में प्रोटीन पाया जाता है। जो छोटे बच्चे और बूढ़ों के लिए काफी फायदेमंद होता है। मशरूम में उतना ही प्रोटीन होता है, जितना की किसी भी प्रकार के मांस में होता है इसलिए वैसे लोग जो शाकाहारी होते है, प्रोटीन के लिए इसका प्रयोग कर सकते है। इसकी खेती घर का सारा काम करने के बाद बचे समय में मशरूम की खेती किया जा सकता है। इसके लिए अलग से समय देने की आवश्यकता नही पड़ती है। मशरूम की खेती से जिले की महिलाओं की बेरोजगारी का भी हल निकाला जा रहा है बरहड़वा प्रखंड की रेशमी देवी ने बताया कि मशरूम की सब्जी बनाकर खाती भी हैं और बेचकर भी मुनाफा कमाती हैं। जिले के ग्रामीण क्षेत्रों में जब धान का पुआल सड़ने लगता है तो इससे मशरूम निकलता है और गांवों में लोग इसकी सब्जी बनाकर बड़े चाव से खाते हैं जिससे न केवल उन्हें रोगों से मुक्ति मिलती है बल्कि वे बाजारों में इसे बेचकर भी लाभ कमाते हैं। साहिबगंज जिले के ग्रामीण हाटों से लेकर बाजारों में भी मशरूम बेची जाती है।

मशरूम की खेती

वर्तमान समय में बढती  हुई जनसंख्या के कारण लगातार कृषि जोत भूमि घटती जा रही है जिसके कारण पौष्टिक खाद्य पदार्थ का उत्तपादन कर पाना एक समस्या बनता जा रहा है | इस  परिस्थिति में मशरूम की खेती करना आवश्यक समझा जाने लगा है | क्योकि मशरूम में प्रोटीन , विटामिन एवं खनिज लवण पर्याप्त मात्रा में पाया जाता है तथा इसकी खेती के लिए खेत की जरूरत भी नहीं पड़ती है, बस एक छायादार कमरे के अन्दर चाहे वो घास का हो या कच्चे या पक्के मकान का एक कमरा हो, बस हवा का आवागमन एवं पानी की सुविधा हो बस हम सुगमता पूर्वक मशरूम की खेती  कर सकते है | इसकी खेती की एक और विशेषता होती है की यह अन्य सब्ब्जी या अनाज की भाति अधिक समय नहीं लेती है |  यदि बिज उपलब्ध हो तो ३० दिन के अन्दर इसकी फसल तैयार हो जाती है |  और अगर हम इसका तापमान नियंत्रित कर सके तो हम इसकी खेती सालभर कर सकते है |
और इसकी खेती करना भी बहुत आसन है बस हमें गेहू का भूसा, धान की पुआल, ज्वार या फिर बाजरे का डंठल चाहिए | हमें  भूसे को साफ पानी से भिगान है और उस भीगे हुए भूसे को एक पालीथीन में भरना है और भूसा भरते समय ही एक लेयर भूसे का एवं उसके ऊपर कुछ बिज मशरूम के फिर एक लेयर भूसे का  और एक लेयर मशरूम के बिज का इसी तरह कर के  रख देना है ताकि भूसा चारो तरफ फ़ैल ना सके और उस पालीथीन में कुछ सुराख़ भी कर देना चाहिए जिससे की हवा आ, जा सके और प्रतिदिन भूसे पर साफ पानी का छिडकाव करना चाहिए | बस ३० दिनों के अन्दर मशरूम तैयार हो जायेगा |
हमारे देश में बहुत से किसान इन फसल अवशेष को जला देते है जिससे की वायु में प्रदुषण बढ़ जाता है और पर्यावरण असंतुलित हो जाता है जिसका प्रभाव प्रकृति में रहने वाले अन्य जीवो पर पड़ता है | अतः मशरूम की खेती  करने से पर्यावरण को सुरछित रखा जा सकता है | मशरूम उत्तपादन के पश्चात् जो भी फसल का अवशेष बचाता है उसका उपयोग हम जैविक खाद बनाने में ला सकते है एवं अपने खेतो में डाल सकते है | जिससे की खेत की उरवरा शक्ति में में ब्रिधि होगी, तथा खेत में जीवाष्म की मात्रा बढ़ेगी| इस तरह करने पर हमारे खेत की भौतिक एवं रासायनिक संरचना में सुधार होता है |

मशरूम ने बदली किसानों की जिंदगी

मशरूम की खेती से छत्तीसगढ़ के किसानों की जिंदगी बदल रही है। राज्य के बागवानी विभाग ने किसानों को मशरूम की खेती की ट्रेनिंग दी है और इस वजह से कई किसानों ने इस ओर कदम रखा है।

रायपुर के पास स्थित जोरा गांव के किसान माधव वर्मा को अब पता चल गया है कि मशरूम कितना 'स्वादिष्ट' होता है। इस किसान ने छोटे से इलाके में मशरूम की खेती कर इस साल मोटा मुनाफा कमाया है। वैसे वर्मा अकेले ऐसे किसान नहीं हैं।

राज्य के बागवानी विभाग ने नैशनल हॉर्टिकल्चर मिशन के तहत सात जिलों के करीब सात हजार किसानों को मशरूम की  खेती की ट्रेनिंग दी है। मिशन के तहत मशरूम की खेती को प्रोत्साहित किया जा रहा है ताकि ज्यादा से ज्यादा किसान इसकी खेती का रुख कर सकें।

कवर्धा कृषि महाविद्यालय के डीन और राज्य के वरिष्ठ मशरूम वैज्ञानिक डॉ. एम. पी. ठाकुर ने कहा कि शुरुआती दौर में इसके काफी अच्छे नतीजे सामने आए हैं और किसानों ने मशरूम की खेती में काफी दिलचस्पी ली है। उन्होंने कहा कि इस साल मशरूम का उत्पादन काफी हद तक बढ़ने की उम्मीद है।

सूत्रों ने कहा कि पिछले साल कुल सात हजार टन मशरूम का उत्पादन हुआ था, लेकिन इस साल इसके दस हजार टन तक पहुंचने की उम्मीद है। ठाकुर ने कहा कि आने वाले वर्षों में छत्तीसगढ़ में भी मशरूम की खेती होगी। गौरतलब है कि यहां धान की अच्छी पैदावार होती है।

राज्य सरकार ने मशरूम की खेती को बढ़ावा देने के लिए न सिर्फ अभियान चलाया बल्कि इसके लिए किसानों को ट्रेनिंग भी दी। जोरा गांव के किसान माधव वर्मा ने कहा कि जब अधिकारियों ने मुझे मशरूम की खेती के फायदे बताए तो मैंने इस साल पहली बार इसकी खेती शुरू की।

उन्होंने कहा कि न्यूनतम निवेश और कम समय में मैंने काफी मुनाफा कमाया। वर्मा 200 वर्गफीट क्षेत्र में मशरूम की खेती करते हैं और इससे उन्हें एक-डेढ़ लाख रुपये की आय हुई। अधिकारियों ने बताया कि राज्य में मशरूम की विभिन्न किस्मों की कीमतें 80 रुपये से 100 रुपये प्रति किलोग्राम के स्तर पर है।

राज्य में रायपुर, कोरबा, बस्तर, सरगुजा, बिलासपुर, दुर्ग और कवर्धा जिलों की पहचान मशरूम की खेती के लिए की गई है। हर जिले से करीब एक हजार किसानों का चयन कर उन्हें रायपुर विश्वविद्यालय में ट्रेनिंग दी गई है। अधिकारियों ने बताया कि इस साल कुल सात हजार किसानों को मशरूम की खेती की ट्रेनिंग दी जा चुकी है।   

मशरूम पुलाव बनाने की विधि

मशरूम पुलाव बनाने में इस्तिमाल होने वाली सामग्री
500 ग्राम सफ़ेद बड़े मशरूम, चार कटोरी चावल, एक कप कसा हुआ पनीर, दो बड़ी चम्मच मक्खन, चार बड़े टमाटर, चार बड़े प्याज, तिन छोटी चम्मच पिसा नमक, तिन बड़ी चम्मच घी या तेल, दो चुटकी काली मिर्च

विधि
सबसे पहले चावलों को बीनकर पानी से अच्छी तरह धो लें और फिर चावलों को पानी में भीगने रख दें|
मशरूम के छोटे छोटे टुकड़े गर्म घी या तेल में हल्के से तलकर शेष घी या तेल में कटी प्याज को सुनहरी तल लें|
अब कटे हुए टमाटर में नमक व थोड़ी सी काली मिर्च डालकर भुन लें| जब टमाटर का रस सुख जाये तो इसमें तले हुए पनीर व मशरूम मिलाकर ढक्कन बंद कर दें तथा पांच मिनट तक धीमी आंच में पकाएं|
इसके बाद डेढ़ छोटी चम्मच नमक, दो चुटकी काली मिर्च तथा मक्खन डालकर चावल पकाएं|
अब ओवन की दिशा में सबसे नीचे चावल, उसके ऊपर मशरूम तथा चावल बिछा दें|
अंत में छह सात तले मशरूमों को सजाकर 10 मिनट तक बेक करें|
इस तरह आपका स्वादिश मशरूम पुलाव तैय्तार हो जाएगा|

लेख पढ़ने के लिए धन्यवाद

रोजगार और पैसा दिलाये ‘धन की छतरी’

पूर्ण रूप से शाकाहारी भोज्य पदार्थ मशरूम (खुम्ब) का उत्पादन हाल के वषा] से दूसरे व्यवसायों की अपेक्षा कम समय में अधिक पैसा प्रदान करने वाले उद्योग के रूप में पनपा है। हालांकि ब़डे स्तर पर मशरूम उत्पादन के लिए अधिक पूंजी की आवश्यकता होती है पर एक छोटे से कमरे में बहुत कम पूंजी लगाकर भी आप मोटा मुनाफा कमा सकते हैं, लेकिन इसके लिए यह अपेक्षित है कि मशरूम उगाने से पहले आपको इसकी खेती के बारे में कुछ बुनियादी बातों की जानकारी हो।
मशरूम मुख्यतः दो प्रकार के होते हैंः विषैले तथा विषरहित। आपने बारिश के दिनों में अपने आप उग जाने वाले कुछ मशरूम देखे होंगे, वो विषैले होते हैं, लेकिन वैज्ञानिक तरीके से घर या खेत में उगाए जाने वाले मशरूम विषरहित तथा पौष्टिक होते हैं। इनमें पौष्टिकता के साथसाथ खनिज, प्रोटीन तथा विटामिन्स का भी भंडार होता है तथा रोगकारक कोलेस्ट्रॉल, शक्कर और सोडियम जैसे तत्वों की मात्रा भी बहुत कम होती है, जिससे ये उच्च रक्तचाप व मधुमेह के रोगियों के लिए भी एक सुरक्षित खाद्य पदार्थ है।
विषरहित मशरूम की भी कई किस्में हैं, जिनमें से भारत में तीन प्रकार के मशरूम (पैडस्ट्रा मशरूम, सफेद बटन मशरूम तथा ढींगरी मशरूम) ही अधिक उगाए जाते हैं। इनमें भी ढींगरी मशरूम की खेती सबसे ज्यादा होती हैं, क्योंकि इसकी उपज दूसरे मशरूमों की अपेक्षा प्रति वर्ग मीटर २३ गुना अधिक मिलती है। 
कितना करें पूंजी निवेश?
अगर आप घर में ही मशरूम उगाना चाहते हैं, तो इसके लिए शुरुआती तौर पर १०००१५०० रुपये तक के खर्च में ही इसकी शुरुआत कर सकते हैं और शुरू में ही लागत से चार गुना तक लाभ कमा सकते हैं। कुछ ही समय बाद आप घर में ही मशरूम उगाकर हर महीने ५ से १५ हजार रुपये तक कमा सकते हैं। अगर आप ब़डे स्तर पर अर्थात्‌ खेत में मशरूम उगाना चाहें तो इसके लिए सरकार द्वारा ऋृण की सुविधा भी प्रदान की जाती है, जिस पर करीब ३५ फीसदी तक सब्सिडी भी मिलती है।
लाभ की छतरी
मशरूम को हम ‘लाभ की छतरी’ इसलिए कह रहे हैं, क्योंकि एक बार पॉलीथीन बैग में मशरूम के बीज उगाकर आप उसी से लगातार पांच बार तक फसल प्राप्त कर सकते हैं। पॉलीथीन बैग में मशरूम के बीज डालने के २०२२ दिन बाद ही पौधे में फूल आ जाते हैं, जो मशरूम की फसल कहलाते हैं। उसके ४५ दिन बाद ही पौधे में कलियां निकलनी शुरू हो जाती हैं। जब मशरूम का फूल पूरी तरह खिल जाए, तब उसे त़ोड लिया जाता ह्‌ै। एक बार मशरूम त़ोडने के बाद मशरूम वाले बैग में दोबारा पानी देने से १०१२ दिनों बाद फिर से फसल तैयार हो जाती है और इसी तरह यह प्रक्रिया पांच बार तक चलती है यानी एक बार की लागत में पांच बार फसल मिलती है।
कहां उगाएं मशरूम?
ब़डे स्तर पर मशरूम की खेती करने के लिए खेत का चुनाव कर सकते हैं, लेकिन अगर घर में ही मशरूम उगाना चाहें तो उसके लिए इस बात का ध्यान रखें कि जहां भी आप मशरूम उगाना चाहें, वहां का तापमान ठंडा होना चाहिए। आप घर के ही किसी खाली कमरे का भी मशरूम उत्पादन के लिए उपयोग कर सकते हैं, लेकिन यह अवश्य ध्यान रखें कि जहां भी आप इसका उत्पादन करना चाहें, उस कमरे में सूर्य की किरणें सीधी न पहुंचती हों और कमरे का तापमान २०३० डिग्री सेंटीग्रेड के बीच ही हो, कमरे में आर्द्रता (नमी) भी ६० प्रतिशत से अधिक हो।
कहां से प्राप्त करें कच्चा माल?
मशरूम उगाने के लिए चावल, गेंहू, जौ, ज्वार, बाजरा, मक्का, कपास, गन्ना इत्यादि की सूूखी पत्तियों, डंठल व भूसे की तथा कपास के व्यर्थ अवशेष पदाथा], मक्का के छिले हुए भुट्टों, मूंगफली के छिलकों, सूखी घास, इस्तेमाल की हुई चाय की पत्ती इत्यादि की जरूरत होती है और इस प्रकार के कृषि अवशेष हमें खेतों से आसानी से प्राप्त हो जाते हैं। इसके अलावा मशरूम के बीज आप बाजार से या किसी कृषि विज्ञान केन्द्र से खरीद सकते हैं।
कैसे करें बुवाई?
पानी में फार्मेलीन मिलाकर पानी को कीटाणुरहित करके इसमें उपरोक्त कच्चे माल (कृषि अवशेषों) को ८१० घंटे तक भिगो दें और इस अवशेष को पॉलीथीन के बैगों में भर दें। इन्हीं बैगों में बीचबीच में मशरूम के बीज डालते जाएं। बीजों को अंकुरित होने के लिए हवा मिलती रहे, इसके लिए पॉलीथीन बैगों में बीचबीच में कुछ सुराख कर दें। अब इन बैगों को ऊपर किसी सहारे से बांधकर लटका दें।
कितना मिलेगा उत्पादन?
अगर आप एक साधारण आकार के कमरे में मशरूम उगा रहे हैं, तो यह मानकर चलें कि आपको एक बार की लागत में मिलने वाली पांच बार की फसलों से ही ५००१००० किलो तक मशरूम प्राप्त हो जाएगाऔर चूंकि थोक बाजार में ही ताजी मशरूम का भाव ५५७० रुपये किलो तक है, अतः आपको ५० रुपये किलो के हिसाब से बिकने पर भी कम से कम २५०० रुपये की कीमत तो वसूल हो ही जाएगी।
कहांं बेचें?
आजकल कई प्रकार के देशीविदेशी व्यंजनों में मशरूम की खास डिमांड रहती है, अतः खासकर ब़डेब़डे होटल मशरूम के सबसे ब़डे ग्राहक है। इसलिए आप सीधे इन होटलों से सम्पर्क कर सकते हैं या फिर सब्जी मंडियों में ब़डे व्यापारियों को भी मशरूम बेच सकते हैं।
कहां से लें प्रशिक्षण?
अगर आप व्यावसायिक स्तर पर मशरूम का उत्पादन शुरू करना चाहते हैं, तो इसके लिए बेहतर हैं कि आप मशरूम की खेती वैज्ञानिक तरीके से करने के लिए इसका विधिवित प्रशिक्षण लें। अधिकांश कृषि विज्ञान महाविद्यालयों तथा कुछ निजी संस्थाआें द्वारा यह प्रशिक्षण दिया जाता है, जो ५७ दिन का ही होता है और इसके लिए ५००२५०० रुपये तक ही फीस लगती है।